टीवी दिखाता नहीं डराता है

टीवी हांफ रहा है । दमा है या टीबी ये तो ख़ून या बलगम की जाँच से पता चलेगा । टीवी अब साथी कम पार्टी ज़्यादा लगने लगा है । किसी गाँव या शहर में जाइये टीवी को लेकर लोग सवाल करने लगे हैं । टीवी के दो पर्यायवाची शब्द आम फ़हम हो चले हैं । चैनल और सर्वे । मैं जिन लोगों से मिला वो अब पत्रकार को एजेंट के रूप में देखने लगे हैं । सफ़ाई देते देते थक गया कि प्लीज़ ऐसा मत कहिये । जवाब यही कि हम आपको व्यक्तिगत रूप से नहीं कह रहे हैं । उन्हें लगता है कोई गुड्डा हाथ में कैमरा और माइक लिये आ गया है जिसकी डोर किसी और के हाथ में है । मीडिया इतना क्यों दिखा रहा है और एक ही का क्यों दिखा रहा है । "पहले टीवी बताता था, दिखाता था अब टीवी डराता है ।" एक गाँव का बुज़ुर्ग किसी चौमस्की की तरह आराम से कह गया । 

शहर,क़स्बा और गाँव । चाय वाला से लेकर टीचर । कई लोग मिले जिन्हें लगता है कि जो वो कह रहे हैं वो दिखेगा नहीं । इसलिए जो पहले से दिख रहा हैं वही कह रहे हैं । विकास और नेतृत्व जैसे सवालों पर वैसे ही बोल देते हैं जैसे टीवी बोलता है । जैसे टीवी सुनना चाहता है । कैमरा बंद होने के बाद ऐसी कई आवाज़ें सुनने को मिलीं जो अपने ही कहे का उल्टा थीं । लोग भी टीवी से खेल रहे हैं । झट से कोई कार्यकर्ता आम आदमी बन जाता है । बाद में पता चलता है कि वो किसी पार्टी का है । सारे कार्यकर्ताओं को पता है कि चुनाव के टाइम में पत्रकार आ सकता है । गाँव के किसी कोने में शूट कर रहे हैं अचानक पार्टी के लोग चले आते हैं । प्रभुत्व पार्टी के लोग । पीछे से ज़ोर ज़ोर से नारे की शक्ल में बात करने लगते हैं । अचानक भीड़ भी वही बोलने लगती है । टीवी के पैदा विमर्श ने ज़मीन पर ऐसे लोगों का दबदबा बढ़ा दिया है । ऐसे लोगों के आने के बाद लोग चुप हो जाते हैं । उसे ही बोलने देते हैं । जिसे मैं कई बार भरमाना कहता हूँ । जो ऊँचा बोलता है समाज उसे बोलने देता है । लेकिन इसका असर हो रहा है । कई लोग वैसा ही बोलने लगते हैं जैसा बोलने की छूट टीवी पर दिखती है । हम सब एक मीडिया समाज में रहते हैं । यह टीवी का 'बेंग काल' है जहाँ टीवी और उसका दर्शक टर्र टर्र करने लगते हैं । अविश्वसनीय होकर भी टीवी विश्वसनीय माध्यम हो गया है । टीवी इस चुनाव का सबसे सशक्त राजनीतिक कार्यकर्ता है । टीवी के असर को कम मत आँकिये ।

गाँवों में लोग विज्ञापन को लेकर सवाल करते हैं । उन्हें शक है कि जो पत्रकार सामने हैं वो स्वतंत्र है भी या नहीं । "आप अच्छे हैं लेकिन आप जिस सिस्टम में काम करते हैं उस पर आपका कितना बस चलता है ।" यह बात तमाचे की तरह लगी । " कल पुर्ज़ा से कारख़ाना बनता है पर पुर्ज़ा कारख़ाना नहीं होता साहब" ये पंक्ति एक बेरोज़गार युवक की है जिसने सोशल मीडिया पर टीवी की हो रही आलोचना की ज़ुबान को पढ़ा भी नहीं होगा । 

किसी भी दर्शक को ऐसे ही होना चाहिए । इन सब बातों पर तिलमिलाया तो नहीं पर मुस्कुराया ज़रूर । दाँत चियारने के अलावा चारा भी क्या था । कहीं कहीं तो टीवी को लेकर ग़ुस्सा इतना भयानक था कि पूछिये मत । हर आदमी घेरकर यही पूछ रहा था । नाप रहा था कि आप किसकी तरफ़ से बिके हैं । आपका मीडिया बिका हुआ है । बार बार सुनाई दिया । कई लोग मिले जो कहते नज़र आए कि अब तो साहब टीवी बंद कर दिया है । क्या देखना है । वही बातें बार बार । ख़बर तो होती नहीं है । 

'टीवी कम देखिये' मैं रोज़ रात को ट्वीट करता था लेकिन लगता है उन लोगों ने पढ़ लिया जो ट्वीटर पर नहीं टीवी पर हैं । वे टीवी कम देखने लगे हैं । हालाँकि यह भी आँकड़ा आने ही वाला होगा कि चुनाव में टीवी के दर्शकों की संख्या बढ़ गई है । ऐसा होता भी है । टीवी को लेकर सवाल करने वाले ऐसे कितने लोग हैं । पर ऐसे लोगों की तादाद बढ़ने लगी है । 

टीवी उस नेता की तरह है जिसके बारे में सब जानते हैं कि यह किसका एजेंट है, इसके धंधे क्या है, किस चीज़ का माफ़िया है, जात क्या  है, यह कभी हमारा काम नहीं करेगा लेकिन वोट तो लोग उसी नेता को देते हैं । यह अविश्वास से पैदा हुआ प्रेम है !  जैसे राजनीति का विकल्प नहीं वैसे अख़बार टीवी का भी तो नहीं है । सोशल मीडिया ? सोशल मीडिया लोगों का कितना रहा । वहाँ भी वही अख़बार टीवी चल रहा है । हम अख़बार टीवी के बग़ैर नहीं रह सकते । काश के लोग ऐसी नाराज़गी पर केबल कटवा दें और अख़बार बंद कर दें । 

मैं अक्सर कहता हूँ कि किसी वोटर को किसी नेता का फ़ैन नहीं होना चाहिए वैसे ही किसी दर्शक को किसी एंकर या रिपोर्टर का फ़ैन नहीं होना चाहिए । फ़ैन्स बनते ही आप चतुर निगाहों से देखना बंद कर देते हैं । किसी के प्रति लगाव स्वाभाविक है मगर ऐसा भी न हो जो विश्वसनीयता आपके बीच कोई बना रहा है उसका इस्तमाल कोई और कर ले । डेढ़ महीने से अख़बार नहीं पढ़ा हूँ । टीवी नहीं देखा हूँ । अपवादों के चंद मिनटों और पन्नों को छोड़कर मैं भी उन दर्शकों की तरह हो गया हूँ जो टीवी को लेकर सवाल करते हैं । हम सब कृत्रिम रूप से पैदा एक महान विमर्श का पीछा करने वाले लोग हैं । यह बहुत अच्छा है । मीडिया पर अविश्वास लोकतंत्र को समृद्ध करता है । ये वो लोग हैं जो टीवी के बनाए भ्रमजाल से निकल आए हैं और इन लोगों के पास वैकल्पिक विमर्श पैदा करने की ताक़त नहीं है । जैसे नेता वोटर की मजबूरी जानता है वैसे ही टीवी दर्शकों की । बाक़ी तो जो है सो हइये है ।


दर्दे टेम्पो इन बनारस

पेड़ पर बोतल

मार्केटिंग के गुर सिर्फ मुंबई की विज्ञापन कंपनियों को नहीं आते । हिन्दुस्तान के क़स्बों शहरों से गुज़रते हुए एक से एक स्लोगन और सामान बेचने की तरकीब से टक्कर हो जाती है । आज़मगढ़ में एक दुकानदार ने अपने बोतलों को पेड़ पर ही टाँग दिया है ताकि दूर से ही दिख जाए । आसपास की दुकानों से लोहा लेने के लिए उसमें ऐसा किया क्योंकि उसकी दुकान भीतर है और सड़क पर लगे ठेलों के कारण ग्राहक की नज़रों से छिप जाने का ख़तरा है ।






यूपी की सड़क पर गुजरातन अलबेली

चाय


कानपुर लखनऊ राजमार्ग पर यह चाय की दुकान मौजूद है । इस शख़्स को अपनी दुकान के एकांत में इस तरह बैठा देख देर तक देखता रहा । कोई नई बात तो नहीं है । ऐसे लोग तो बहुत हैं । अंतिम आदमी की तरह बैठे इस शख़्स के क़रीब गया तो साँस की तकलीफ़ से काँप रहा था । छाती ज़ुबान को खींच ले रही थी ।

इन्होंने बताया कि दिन में बीस रुपया कमा लें बहुत है । इतनी धूल है कि कोई आता नहीं । बस इस बुढ़ापे में एक जगह मिल गई है । वोट दे देंगे । किसे देंगे मालूम नहीं । अख़बार ख़रीद नहीं सकते । हम तो बस चाय बेचते हैं । इनकी दुकान के वक्त अंबेडकर की एक मूर्ति लगी थी । बिल्कुल इनकी तरह सिकुड़ कर छोटी हो चुकी मूर्ति । मूर्ति के नीचे शराब की छोटी बोतलें गिरी थी । अंतिम आदमी की आँखें नाच रही थीं । हम दोनों एक दूसरे को अपराधी की निगाह से देख रहे थे । 

थोड़ी देर बाद कानपुर इलाहाबाद मार्ग पर शुक्ला ढाबा पर था । वहाँ चाय की यह प्याली आई । पूछा कि नीचे सिल्वर पत्ती क्यों लगी है । प्याला रिस रहा है क्या । नहीं सर । शोभा के लिए है । चाय चाय का फर्क है बाबू ।

नारायण नारायण



खंडहर होते मकानों की कशिश

शहर गाँव क़स्बों से गुज़रते हुए ऐसे मकानों को देख कुछ हो जाता है । मैं इनके वक्त में चला जाता हूँ । जब से बने होंगे । चमकते होंगे । कोई बड़ा आदमी होगा या पहली बार पैसा कमाया होगा । घर की नक़्क़ाशी कराई होगी । बालकनी और बाहरी दीवारों को जालीदार बनाया होगा । एक समय लोग हैरत से इतने बड़े घरों को देखते होंगे । इनमें रहने वालों का अपनी कोई सपना होगा । 


इसी ब्लाग पर आप पन्ने पलटेंगे तो ऐसे मकानों की तस्वीर दिखेंगी । एक दौर में हमारे शहरी होने का अनुभव बेहद कुलीन तरीके से दर्ज है । मुंबई दिल्ली के पुराने मकानों का अध्ययन तो है मगर बाक़ी शहरों का नहीं । अन्य जगहों के नवजात अमीरों या मध्यम वर्ग का कोई क़िस्सा नहीं है ।

हर शहर में कुछ लोग समृद्ध होते हैं कुछ लोग कंगाल । एक शहर में एक सज्जन मिलने आए । सत्तर के दशक में उनके दादा के भाई केंद्र में वित्त राज्य मंत्री और सूचना मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री रहे थे । दादा जी संविधान सभा के सदस्य । जिस सड़क पर रहते हैं वो अब दादा जी के नाम पर तो है लोग उन्हें भूल चुके हैं । जनाब अपने दादाजी या परिवार के उस इतिहास को पुराने कंबल की तरह लपेटे हुए लगे । शायद कुछ गर्मी मिलती होगी ।


मैं क्यों लौटता हूँ उस दौर में पता नहीं । पर ये बचे खुचे मकान मुझे रोमांचित करते हैं । घर किसी का सपना होता है और हर सपने का अपना एक वक्त या दौर । कभी कभी लगता है कि जिसने पलायन नहीं किया वो जड़ हो गया । वो अपने दौर में चूक जाता है । हर शहर में पुराने रईसों के मकान जड़ हो गए हैं । कइयों ने तो ढहाकर उस अतीत से छुटकारा पा लिया है मगर कुछ मकान बचे मिल जाते हैं । जिनके लिए मैं अपने फ़ोन का कैमरा तैयार रखता हूँ । गाड़ी से गुज़रते हुए दिखा नहीं कि क्लिक ।


छोटी सी इक बात

जशोदाबेन को लेकर जो कहा जा रहा है उसमें गंभीर विमर्श कम चटखारे ज़्यादा है । मोदी ने क्यों पहले स्वीकार नहीं किया और अब क्यों नहीं किया इसके आगे जशोदाबेन को घसीटना उचित नहीं है । नेताओं को इससे बचना चाहिए । नरेंद्र मोदी का विरोध करने के लिए सौ चीज़ें हैं मगर यह मामला दो व्यक्तियों के बीच का है । दोनों वयस्क हैं । सार्वजनिक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह पति पत्नि का रिश्ता भी आदर और बराबरी से निभाये मगर इसके बाद भी बात हज़म नहीं हो रही है कि यह चुनावी मुद्दा कैसे हैं । है भी तो क्या इसलिए कि इसमें मज़ा आ रहा है । चुनावों के समय राजनीतिक दलों की टीम ऐसी रणनीतियों से लैस होती है । कोई किताब लिखता है तो कोई शादी की तस्वीर लेकर आ जाता है । इसी में चुनाव के समय के दो चार दिन निकल जाते हैं । 

जशोदाबेन के आत्मसम्मान का आदर किया जाना चाहिए । यह जीवन और चुनाव उनका है । बल्कि अगर पति ने छोड़ भी दिया तो क्या यह कम तारीफ़ की बात है कि उन्होंने खुद को उनके सामने कातर की तरह पेश नहीं किया । यह एक महिला का आत्म सम्मान है । मोदी तीन बार से चुनकर मुख्यमंत्री हैं । वो चाहतीं तो प्रेस कांफ्रेंस कर तमाशा कर सकती थीं । मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया । वो गिड़गिड़ा सकती थीं पर ऐसा भी नहीं किया । उन्होंने अपनी ज़िंदगी का रास्ता सम्मान के साथ चुना जिसका हमें आदर करना चाहिए । मियाँ बीबी के बीच सौ बातें होती हैं । तलाक़ होता है और संबंध विच्छेद भी । इसके कई पक्ष होते होंगे लेकिन इसका राजनीतिक इस्तमाल किसी के विरोध के नशे में ख़राब राजनीतिक परिपाटी बनाता है । 

जशोदाबेन की चुप्पी में सिसकियाँ हो सकती हैं मगर स्वाभिमान ज़्यादा लगता है । मोदी मुख्यमंत्री बनने से पहले भी पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं । वे तब भी उनके पास लौटने के लिए गुहार कर सकती थीं । हमें मालूम नहीं कि दोनों के बीच क्या हुआ इसलिए इसे लेकर अटकलें करना रसरंजन लगता है । यह सवाल बड़ा है तो सही मेें इसे सिर्फ मोदी के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए । राहुल वारिस क्यों बनते हैं प्रियंका क्यों नहीं । यह भी तो सवाल है । नारायण दत्त तिवारी का बेटा अपने हक़ की लड़ाई लड़ता है । यह एक क्रांतिकारी नज़ीर है । न जाने ऐसे कितने बच्चे नाजायज़ रिश्तों की आड़ में हकों से वंचित किये गए होंगे । जशोदाबेन ने ऐसा कोई रास्ता नहीं चुना । मुलायम का दूसरा बेटा प्रतीक किसी औपचारिक रिश्ते से है या नहीं जब इस पर बहस नहीं हुई तो फिर मोदी जशोदाबेन को लेकर क्यों । बीजेपी के लोग भी अति कर रहे हैं । बनारस में पोस्टर लगा रहे हैं कि वे बुद्ध की तरह संशोधकों को छोड़ कर चले गए । हास्यास्पद है । ऐसा कर वे भी जशोदाबेन को सता रहे हैं । 

इसलिए जशोदाबेन को लेकर सहानुभूति जताने वालों या चटखारे लेने वालों को थोड़ा संयम बरतना चाहिए । ऐसा कर हम जशोदाबेन की ख़ुद्दारी का भी सम्मान करेंगे । सार्वजनिक व्यक्ति का निजी कुछ नहीं होता मगर कुछ चीज़ें इस दायरे में आती हैं । इस मसले पर मोदी का विरोध करने वाले अचानक कूदने लगे हैं । हम सब अनौपचारिक बातचीत में नेताओं के निजी प्रसंगों को लेकर चटखारे लेते हैं लेकिन उसे सार्वजनिक और औपचारिक रूप देना ठीक नहीं । विरोधियों को चाहिए कि वे जशोदाबेन की चुप्पी का चुनावी लाभ उठाने की जगह कुछ और मसलों पर घेरने का परिश्रम करें । जशोदाबेन को छोड़ दें । राजनीति की मर्यादा इसलिए नहीं गिराई जानी चाहिए कि सामने वाले ने गिराई है । 



तस्वीर बनाता हूँ तस्वीर नहीं बनती






संशय से निकलते हुए राहुल

नरेंद्र मोदी, मायावती के बाद राहुल गांधी की रैली से आ रहा हूँ । टीवी पर राहुल के सपाट भाषणों को सुना है मगर ज़माने बाद या शायद पहली बार सामने से सुन रहा था । राहुल गांधी का भाषण बदल रहा है । शुरू में जिस तरह का अबोध लगता था अब बहुत बेहतर तो नहीं लेकिन पहले से सुधरा हुआ लग रहा है । राहुल गांधी का यह कमज़ोर पक्ष कुछ ठीक होता लग रहा है । 

भाषणों का मूल्याँकन करें तो राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के आगे कहीं नहीं ठहरते । मैं बात दलील की नहीं शैली की कर रहा हूँ । मोदी अपने भाषण और भीड़ को टीवी और दर्शक के रिश्ते में बदल देते हैं । ग़ुस्सा  भी होता है, आवाज़ में उतार चढ़ाव होता है, अपनी बात को उस मौक़े तक ले जाने की चतुराई होती है जहाँ लोग या तो सिर्फ हाँ कहें या ना या ताली बजायें । नाटकीयता, भावुकता और गंभीरता सबका मिश्रण । मोदी अपने कमज़ोर पक्ष को भी ताक़त में बदल देते हैं । मुहावरों और क़िस्सों की कलाबाज़ी में माहिर हैं । 

बोलने में मोदी के मुक़ाबले लालू ही ठहरते हैं । मगर लालू अब मीडिया के प्रिय नहीं रहे । लालू का वक्त भी नहीं रहा । मीडिया को मोदी मिल गए हैं । मोदी हँसाते हैं,आँख दिखाते हैं और हमले करते हैं । कई बार झूठ सच सब मिलाकर बोल जाते हैं । मोदी जीतने की अदम्य इच्छाशक्ति से भरे हुए हैं । जिसका असर उनके बोलने में दिखता है । खुद को दावेदार के रूप में इस तरह पेश किया है जिसके कारण ध्यान चला जाता है । इसलिए बोलने में मोदी को बढ़त मिल जाती है । क्या बोलते हैं से ज़्यादा कैसे बोलते हैं महत्वपूर्ण हो जाता है । 

राहुल गांधी बोलते वक्त काफी सोचते हैं कि कहीं भारी न पड़ जाए । इस चक्कर में कई बार बोलते नहीं । 'रेटरिक' नहीं आती है । मोदी जिस तरह सटीक निशाना लगाते हैं राहुल तानते तो सही हैं मगर तीर छोड़ते वक्त धनुष को ढीला कर देते हैं । इसलिए मोदी की तुलना में राहुल की बात पर कम तालियाँ बजती हैं । जैसे ही लगता है कि राहुल हमला करने वाले हैं वे उस बात से उतर कर कुछ और कहने लग जाते हैं । कभी नाम लेते हैं कभी नहीं । इसलिए वे बोलते हुए मनोरंजन कम करते हैं । ज़रूरत से ज़्यादा संजीदा हो जाते हैं । एक अपराधबोध या सतर्कता आ जाती है जिससे उन्हें लगता है कि ये बोलूँगा तो लोग मुझे भी बोलेंगे । 

मोदी कुछ नहीं सोचते । वे बोलते हैं बल्कि कई बार बोलते हैं ।  जिस तरह से आज राहुल ने मोदी के प्रचार की बात की वो हमला नहीं लगा । ऐसा लगा कि राहुल कह रहे हैं । आक्रमण नहीं कर रहे । मोदी को यही बात कहनी होती तो वे क़िस्सों में बदल देते । कहते कि आपने देखा है नेता जी अभी से तरह तरह के कुर्ते में सज रहे हैं । रोज़ नया कुर्ता । दर्ज़ी परेशान है । कह रहा है कि  शहज़ादे हमारे पास रंग तो छोड़ो कपड़ा भी नहीं बचा है । लगता है टू जी के सारे पैसे से कुर्ते ही सिल गए हैं । थोड़ी अकल होती तो शहज़ादे कुर्ते की जगह छोटा मोटा कारख़ाना ही खोल लेते जहाँ दो चार लोगों को काम ही मिल जाता । शहज़ादे का ध्यान बस इसमें लगा होता है कि आज मैडम सोनिया जी कौन सा कुर्ता सिलवा के देंगी । मोदी ने ऐसा मौक़ा कांग्रेस को दिया मगर राहुल इस तरह की बात नहीं कर पाते । संशय दिख जाता है । हालाँकि वे अब मोदी की नाम लेकर या बिना नाम लिये हमले करने लगे हैं मगर उसमें नाटकीयता या समां बाँधने की कला का अभाव है । 

फिर भी राहुल मोदी को निशाने पर ले रहे हैं । पहले वे अपनी बात कहते थे । भाषण छोटा रखते थे । अब लंबा बोलने लगे हैं । मोदी के ग़ुब्बारे के फटने की बात कर रहे हैं । सपाट ही सही थोड़ा हँसाने का प्रयास कर रहे हैं । ग़ुब्बारा गिरा धड़ाम टाइप से । धूम फ़िल्म के तीन संस्करणों का उदाहरण देते हैं । कैसे शाइनिंग इंडिया का ग़ुब्बारा फूट गया और इसी लाइन में कहते हुए निकल जाते हैं कि दो तीन उद्योगपतियों के पैसे से प्रचार कर रहे हैं । इसी बात को उनसे पहले कांग्रेस का कार्यकर्ता ज़्यादा बेहतर आक्रामक शैली में उठा रहा था । पूछ रहा था कि कहाँ से आया पैसा । राहुल यह सोचने लग गए हों कि कहीं लोग यह न कह दें कि उनके प्रचार का पैसा कहाँ से आता है । 


राहुल देर से ही सही संशय से निकलने का प्रयास कर रहे हैं । यह काम उन्हें तीन महीने पहले करना चाहिए था । कानपुर कांग्रेस का गढ़ रहा है । इस लिहाज़ से भीड़ थी और तमाम रैलियों की तरह राहुल के प्रति आकर्षण भी दिखा मगर राहुल ने उसे खाली हाथ लौटा दिया । 

मोदी हाँ या ना में बात करते हैं ताकि भीड़ तुरंत प्रतिक्रिया ज़ाहिर करे । इस शैली में सोचने या सवाल करने की गुज़ाइश कम रहती है । मोदी की तरह आप किसी भी राज्य की भीड़ में जाकर कहिये कि यहाँ मौजूद लोगों में से किसी को नौकरी मिली । जवाब दो । किसी युवा को नौकरी मिली । ऐसे सामूहिक प्रश्नों का जवाब ना में ही आएगा । ऐसा कर मोदी भीड़ में अनुगूँज पैदा करते हैं । कंपन । राहुल की बात निकलकर कहीं खो जाती है । कौन जानता है लोगों को समझ भी आती हो लेकिन जो दिख रहा है उसे लिख रहा हूँ । 

राहुल अनुगूँज पैदा नहीं कर पाते हैं । राहुल को सुनते हुए लोग चुप रहते हैं । तालियाँ कम बजती हैं । कार्यकर्ता भी मोदी मोदी की तरह राहुल राहुल नहीं करते । नारे नहीं लगाते । बल्कि लोग राहुल की बात को सवालों के साथ सुनने लगते हैं । यह एक बेहतर तरीक़ा है भाषण देने का । लेकिन ' रेटरिक' के बिना रैली नहीं लगती । राहुल को मोदी की तरह नारों की शक्ल में बात करना होगा । मोदी के पक्ष में अख़बारों से लेकर टीवी तक में लेख और भाषण दिये जा रहे हैं । राहुल के पक्ष में आपको कोई लेख नहीं मिलेगा । इसका कारण राहुल ही हैं । वे लोगों को बात करने का कम मौक़ा देते हैं ।

चुनाव में भाषण का भी विश्लेषण होना चाहिए । धीरे धीरे राहुल गांधी बेहतर तो हो रहे हैं मगर देर हो चुकी है । उन्हें रैली या महफिल लूटने की कला नहीं आती । सीख रहे हैं पर सीखे नहीं है । ऐसी बात नहीं है कि उनकी बातों में दम नहीं मगर बात दम की ही नहीं होती साख के समय की भी होती है । फिर भी राहुल इस माहौल को बदल सकते थे । आख़िर अन्ना आंदोलन के समय तक भ्रष्टाचार के मामले में बीजेपी गडकरी और येदुरप्पा को लेकर बैकफ़ुट पर हो ही जाती थी लेकिन मोदी ने आक्रामक तरीका अपना कर अपनी कमज़ोरी को ढंक दिया ।

राहुल को मोदी की तरह मंचीय कवि होना होगा । वे किसी गंभीर व संशयपूर्ण साहित्यकार की तरह कविता पढ़ते हैं । मोदी से सीख लेने में कोई हर्ज नहीं है । इस मामले में वे सोनिया गांधी से भी सीख सकते हैं । लेकिन भाषण देने की मोदी की शैली सर्वमान्य होती तो नवीन पटनायक भी मोदी के भाषणों से उड़ जाते । मायावती उड़ जातीं । नीतीश कुमार टिक नहीं पाते । रमण सिंह तो एक रैली नहीं कर पाते । सबका वक्त होता है । ये राहुल का वक्त नहीं लगता । लेकिन अच्छा है कोई अपने सबसे कमज़ोर वक्त में लड़ाई के बीच में लड़ना सीख रहा है । शायद यह सीख मोदी के सामने संसद में विपक्ष के नेता के रूप में काम आ जाये । वैसे तक़दीर में किसके क्या है कौन जानता है । फ़िलहाल भाषण से तो यही झलकता है ।